आज के दोहे....
पितृ दिवस में केक ले,
आश्रम आया पुत्र।
मन मेरा यह पूछता,
यह है अपना सूत्र।।
दिवस बने हैं फालतू,
अभी-अभी कुछ साल।
भारतीय मछली बने,
पश्चिम फेंके जाल।।
डे अनेक इस देश में,
आज विदेशी चाल।
सनातन रीति भूलकर,
हम भी ठोकें ताल।।
डे चलता जो आजकल,
पश्चिम फेंके इत्र।
पहले के कुछ साल में,
दिवस नहीं थे मित्र।।
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