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शनिवार, 17 दिसंबर 2016

गणेश

गणेश मढ़ाओ योजना
कभू-काल के रखबो सोचेन गणेष,
मैं सुरेश दिनेश अउ रमेश
फेर थैली रहिस हवय खाली,
अब गणेश के जिम्मेदारी,
कोन सम्हालही!
चारो झन मिलके बड़ सोचेन,
एक-दुसर के कान म,
आनी-बानी के बिचार खोंचेन,
ले-दे के होइस एक ठन फैसला,
डब्बा-डुब्बी तो नई मिलिस,
ले आएन एक ठन तसला,
तहाॅं तसला ल धर के निकलगेन,
अउ लगात रहेन गणेश के जयकारा,
बीच-बीच म मन लगय त,
लगावत रहेन नेता मन के नारा,
गप नइ मारन गउकी,
नाॅंदगाॅंव ले गे रहेन चंउकी,
सांझ ले निकले रहेन होगे बिहिनिया,
एको पइसा मिलही तिही ल तो गनिहा!
जेखरे दुआरी म जान मांगे ल चंदा,
उही मन झझकाके कहय-
बंद करव धंधा!!!
आखिर म हार के,
बांस के जगहा रूसे ल गडि़याएन,
गणेष भगवान ल बइठार के,
माड़ी ल मडि़याएन,
अउ हाथ जोड़ के कहेन-
मैं सुरेश् दिनेश अउ रमेश
तोर अतके भक्ति कर सकत हन,
क्षमा करबे श्री गणेश !!

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