बेटा के बलवा
ददा हर बाबूगिरी म,
हला के पइसा सोंटत हे,
तभे तो बटा हर घेरी-बेरी,
हीरा-होंडा ओंटत हे,
दू नंबर के पइसा ल ददा हर,
मर-मर के कमावत हे,
वाह रे लायक बेटा!
ओला पिटरोल म उड़ावत हे,
जेती जाथे तेती ददा के राम-राम हे,
काबर के किसनहा बपरा मन के,
ओखरे से काम हे,
तभोले ददा हर किसनहा मन के
काम ल काम ल टरकात हे,
अउ पइसा मिलही कहिके,
गोठ ल अधरे-अधर बर्रात हे,
अच्छा आज किसनहा मन ला,
फॅंसाएवं कहिके मने-मन मुचमुचाथे,
घर जाके आॅफिस के गोठ ल,
अपन लइका मन ल बताथे,
बाई-लइका मन ला,
आनी-बानी के खवाथे,
अउ अपन हर गली-गली मेछराथे,
बड़े बाबू आॅंव कहिके,
गाॅंव भर ल देखाथे,
उहू समय आथे,
जब वो डाॅक्टर करा,
बाई अउ लइका ल धर के जाथे,
अउ दू नंबर के सोंटे पइसा ले,
दस गुना जादा म भोसाथे,
आनी-बानी के बीमारी म,
बाई-लइका के चटरही भुलाथे,
पइसा जम्मो सिरा जथे त,
उधारी लेके काम चलाथे,
किसनहा मन ल बाबू नई तड़पातीस,
त अइसन दिन हर काबर आतीस,
जादा नहीं संगवारी हो,
अतके मोर जुबानी ए,
आज के स्वार्थी दुनिया के,
अइसने तो कहानी हे।
---------
यहां पर है-
शनिवार, 17 दिसंबर 2016
बेटा के बलवा
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें