अभी खिलकर तैयार हुए हैं,
जिनके मन में अनगिनत अरमान हैं,
जिन्होंने ठीक से बहारों को देखा भी नहीं,
वे भी चाहती हैं हंसना, खिलखिलाना, लहराना,
हवाओं संग बातें करना लेकिन तेरी गिद्ध दृष्टि,
उनकी अभिलाषाओं को दबोच रही हैं,
स्मरण रख, बसंत की समाप्ति,
केवल फूलों के लिए नहीं है...
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