लोगों को अपनी कब्र पे
खूब मुस्कुराते देखा है,
दुश्मन कमबख्त दुश्मन है,
दोस्तों को जश्न मनाते देखा है
जो कहते थे मुझको संसार
गैरों को अपनाते देखा है
मेरे सपनों का घर उजाड़ के
अपना आशियाँ बनाते देखा है
और घर जले तो बुझ भी जाए,
बड़ी शिद्दत से दिल जलाते देखा है।
वे आए तो थे मेरी अंतिम यात्रामें,
जनाब को बाराती सा जाते देखा है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें