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शनिवार, 31 अगस्त 2019

अधूरी लगती है

अधर्म कैसे बढ़ा, धर्म के इस देश में,
चोर और लुटेरे घूमते, संतों के वेश में,
मानवता, दया, ईमान अदृश्य सा है,
इंसानियत का चोला अश्पृश्य सा है,
आज कटु सत्य की क्यों जीत नहीं है,
अत्याचार तनिक भी भयभीत नहीं है,
प्यास बुझने के बाद भी प्यास जगती है,
ऐसे दौर में हर रचना अधूरी लगती है।

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