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शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

लोकतंत्र का व्यापार

सियासत के पुतले,
मन ही मन
मचल रहे हैं,
बाजार में हर तरफ,
खोटे सिक्के ही,
चल रहे हैं,
नेता तो बोस थे,
आज तो देश में
केवल अभिनेता हैं,
दलालों की नीति,
देश के विक्रेता हैं,
चौथा स्तम्भ भी,
चाटुकारिता का,
किरदार है,
स्वार्थ का चबूतरा,
लोकतंत्र का,
व्यापार है।

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