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रविवार, 1 जुलाई 2018

सतकरम के दिया बार

नये-नये ढकोसले,
मुझे आते नहीं,
बर्थडे के चोचले,
मुझे भाते नहीं,
आखिर मेरी शख्सियत,
कौन जानता है!
जन्मदिन मनाने में,
क्या महानता है,
आज भी मिट्टी हैं,
कल धूल हो जाएंगे,
जन्मदिन में,
याद करने वाले,
मेरा मरना भूल जाएंगे।

ढकोसला के गोरसी म,
शेखियै के भुर्री बार डारे,
अपन जनमदिन मना के,
काय बाण मार डारे,
तैं तो बोझा आवस जेला,
भुइँया हर सोज्झे ढोथे,
अरे जनमदिन तो,
कोनो महापुरुष के होथे,
मानवता के तेल ल,
जिनगी के मलिया म ढार,
शेखियै के अंगरा ल छोड़,
सत्करम के दीया बार।

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