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शनिवार, 15 जुलाई 2017

जिंदगी के खत्म होते पन्ने

जब सहा नही जाता अर्थी का वजन,
तब बह जाती है नयनो की धारा,
मजबूर पग बढ़ते है चिता की ओर,
सहमा होता  है हर नजारा,
चीख और क्रन्दन की भयावहता,
सतत् प्रश्न करती तुम कौन?
विस्मय और दुख से घिरता हुआ,
उत्तर मे सिर झुकाता है मौन!
हँस रहा है देख रज-कण,
नश्वरता से साक्षात्कार है हर क्षण,
ऐसा लग रहा मौत बता रही,
जिन्दगी के पन्ने,
खत्म होते रहेंगे क्रमशः...................!!

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