यहां पर है-

शुक्रवार, 9 जून 2017

चल पतरी सकेलबो

चल पतरी सकेलबो,
कोकड़ा भगत मन खा डरिन,
उंखर जूठा ल मेलबो,
चल पतरी सकेलबो।
बपरा मन जनता सेवा के नंगाारा,
मर-मर के बजावत हें,
अपन जी-छुट्टई के बजार म,
पूरा देस ल सजावत हे,
जांगरचोट्टा मन के बोझा ल,
मर-मर के झेलबो,
चल पतरी सकेलबो।
ए डिलवा ले ओ डिलवा,
योजना ल गोहराहीं,
तोर करम के तैं पाबे,
उन अपन भाग सहराहीं,
जम्मों राज खाके हवे भुखमर्रा,
तिखर बर रोटी बेलबो,
चल पतरी सकेलबो।
अधरे-अधर एमन रेवड़ी बांटत हें,
अधिकारी ल देखबे त,
सादा कुरथा के तरूवा चाटत हे,
अरे! अपन बनही पगरइत,
अउ रेगड़ी ल हमन पेलबो,
चल पतरी सकेलबो।।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें