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शनिवार, 27 अप्रैल 2019

जिंदा लाश

बिक चुका है वह दिमाग,
जो कभी सुभाषचंद्र बोस,
बनने की सोचता था,
मर चुका है वह मसीहा जो,
किसी अबला की आबरू बचाने,
क्रांति बनकर आता था,
फूट गई हैं वो आंखें जो,
किसी निरीह की हत्या का,
चश्मदीद थीं,
सूख गए हैं वो आँसू जो,
उस दीन हरिया के लिए,
झील बनकर बहते थे,
कट गए हैं वो हाथ जो अंधेरा चीरने,
मशाल उठाकर कूच कर जाते थे,
कट गए हैं वो हाथ जो अनायास ही,
सूरदास को सड़क पार करा जाते थे,
कट गए हैं वो पैर जो,
कांंटों भरे मार्ग को चुनौती देते थे,
कट गए हैं वो पैर जो,
विधवा काकी की चीख पर,
मदद को दौड़ जाते थे,
मुझे इस जिल्लत भरी जिंदगी से,
मुक्ति का वर दीजिए,
आपने देखी है मेरी जिंदा लाश,
तो अंतिम संस्कार कर दीजिए।

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