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बुधवार, 7 नवंबर 2018

खुद में राम खोजता हूँ

सूर-तुलसी बन नहीं पाया,
चाहता हूँ इंसान बनूँ,
गुमनामी में जो हैं जीते,
उनकी मैं पहचान बनूँ।
खुशियों का भंडार अगर हो,
बाँटूँ सबको बारम्बार,
झुग्गी में कोई सपना देखे,
कर पाऊँ उसको साकार।
देवालय है मन के भीतर,
देव वही पर देखा है,
नित-नित प्रेरित करता रहता,
कर्म प्रधान ही लेखा है।
प्रतिस्पर्धा थी सांसारिकता की,
स्वयं ही वह निर्वासित हो गई,
भौतिकता भी चरम पहुचकर,
शून्य दिशा की तह में खो गई।
जीवन में प्रतिक्षण क्या हो,
निज उद्देश्य सोचता हूँ,
रावण को तो मार गिराया,
अब खुद में राम खोजता हूँ।।

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