यहां पर है-

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

आत्मा का धिक्कार

अहंकार के घोड़े पर सवार हो,
मदद का टुकड़ा काटने चला था,
छाॅंट रखा था दिखावे का मन मैंने,
खैरात में मिले,
खैरात को बाॅंटने चला था,
जब वह नेत्रविहीन होकर भी,
मुझे निहार रही थी,
तब मेरी आत्मा,
मुझे धिक्कार रही थी।
मेरे पेट की आॅंतों में,
तृप्ति का गागर था,
आॅंखों की पुतली में,
नींद का सागर था,
स्वार्थ के दायरे में,
हर साज अपना था,
चलते सुस्त कदमों में,
विलासिता का सपना था,
उसकी अॅंतड़ियों में,
’भूख’ की नागिन,
फुंफकार रही थी,
तब मेरी आत्मा,
मुझे धिक्कार रही थी।
अश्कों की बूंदों को,
बहाना तो चाहा था,
हमदर्दी का काजल,
लगाना तो चाहा था,
दहलीज को पारकर,
पहचान बनाना चाहा था,
शैतानी ताकत को भी,
वह ललकार रही थी,
तब मेरी आत्मा,
मुझे धिक्कार रही थी।
गलतवहमी के आसमान में,
उड़ता जा रहा था,
भ्रम की जंजीरों से,
जकड़ता जा रहा था,
उसकी सहजता को,
लाचारी का नाम दे रहा था,
उसके भोलेपन को,
दया का इल्जाम दे रहा था,
हकीकत को नजरें,
स्वीकार रही थीं,
तब मेरी आत्मा,
मुझे धिक्कार रही थी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें