आकाओं की आवाज़ मौनी हो गई है, इस शहर की सियासत बौनी हो गई है, सोच के साथ-साथ, कर्मों में भी दरख़्त है, मेरे मसीहा का पेशाना, पिंडारियों सा सख्त है, शायद उसे याद नहीं कि आदमी केवल हाड़-मास है, कल का चर्चित रहा डाकू, आज का बदनाम इतिहास है....
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