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शनिवार, 17 दिसंबर 2016

श्रृंगार

श्रृंगार अउ पीरा
साहित्य के चरपा कुढ़ाहे त,
जम्मो रस के बोझा जोरे होही,
मया के भाजी, पीरा के चटनी,
अउ अंतस ल घलो बोरे होही,
बेनी के कुंदरा म, बारी के कुंदरा म,त्र
हिरदय के ठेकवा मोरे बर फोरे होही,
अपन रूप के चुचुवावत सुरूवा घलो,
मोरेच मितवई बर घोरे होही,
फेर पिरावत रइही दाई के छाती,
त श्रृंगार के गोठ थोरे होही।

मनोज कुमार श्रीवास्तव

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