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गुरुवार, 13 नवंबर 2014
हकीकत
हकीकत
कविता के आरंभ में
फैषन मंत्र पढ़ता हूॅं,
आप भी बुलाएॅं फैषन की जय,
षुरूआत करता हॅूं,
भारत में फैषन नहीं था,
इसलिए आयात करना पड़ा,
वर्तमान भाव देखिये,
फैषन का भाव कैसे बढ़ा,
जिस कन्या को देखो,
फैषन की लत है,
लेकिन फैषनी देवियों को देखना,
सरासर गलत है,
ये जहाॅं से गुजरती हैं,
हो जाता है चक्का जाम,
गलती करते हैं ये,
और ट्रैफिक पुलिस बदनाम,
देष के कोने-कोने में,
एक ही आवाज है,
फैषन अपनाओ,
फैषन का राज है,
संस्कृति बचाओ संस्था ने,
एक आयोजन किया,
आयोजन में,
सिंपल बालाओं को निमंत्रण दिया,
आयोजन में प्रतियोगिता रखी गयी,
जिसमें प्रत्येक बाला से,
एक प्रष्न करना निष्चित हुआ,
प्रतियोगिता का उद्देष्य,
विदेषी फैषन को हरना था,
प्रष्नकर्ता का,
प्रथम प्रष्न था-‘‘हमारे देष में,
फैषन कितना सही है?
बाला का उत्तर था-‘‘फैषन
हटाया जाए तो देष का
अस्तित्व ही नहीं है‘‘
प्रष्नकर्ता सोच में पड़ गए,
बाला के उत्तर से डर गए,
उन्होंने दूसरी बाला से
प्रष्न किया-‘‘फैषन समाप्त करने
हेतु क्या करना चाहिए?
बाला का उत्तर था-
’’अति सर्वत्र वर्जयेत होता है,
इसलिए फैषन का,
प्रचार करना चाहिए‘‘
अब प्रष्नकर्ता हड़बड़ाए,
मन ही मन बड़बड़ाए,
सोचने लगे‘ये कैसी बात हो गयी है,
संस्कृति बचाने वालों की,
संस्कृति ही खो गयी है,
अब प्रष्नकर्ता ने अंतिम बाला से,
अंतिम प्रष्न किया-‘‘अष्लीलता,
राकने हेतु क्या करना चाहिए?
बाला ने उत्तर दिया-
‘‘इसमें डरने वाली क्या बात है!
फैषन षत्रु की चुनौती है तो,
मुकाबला करने से क्यों डरेंगे!
वह एक अष्लील हरकत करेगा,
तो हम दस हरकत करेंगे,
इस उत्तर को सुनकर,
प्रष्नकर्ता का मन डोला,
उसने संस्कृति बचाओ छोड़कर,
‘फैषन अपनाओ‘ दुकान खोला,
यह कविता नहीं है,
वर्तमान पीढ़ी की हकीकत है,
यह मानकर चलिए,
इस हकीकत से जो,
सबक नहीं सीखेगा,
भविश्य में उसका अस्तित्व,
कपड़े में नहीं दिखेगा।
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मौलिक एवं अ प्रकाशित
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