अभी तो शमा यूं ही जली है
नूर फैलाना बाकी है,
मयखाने में असर अभी है,
होश में आना बाकी है,
जमीं के भीतर जड़ें गई हैं,
पकड़ बनाना बाकी है,
दुश्मन अभी डरा नहीं है,
अकड़ दिखाना बाकी है,
रात हुई तो ग़म काहे का,
सूरज उगाना बाकी है,
बुजुर्गियत अभी न छोड़ो,
नवजवां का आना बाकी है
बातें बहुत हुई आज़ादी की
मन की गुलामी बाकी है,
व्यक्तिवाद को खत्म करो
राष्ट्र सलामी बाकी है...
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